आँसू

बेहने दे उन आँसुओं को जिसे तूने छिपा के रखा है अपने अंदर,
अपने ही अंदर तू बना रहा है अपने ही आँसुओं का समंदर।
समंदर भी तेरा, आँसू भी तेरे, तो इन्हे बहाने में ये कैसी झिझक?
अपने ही दिल पे से बोज हटाने में क्यों लगता है तुजे इतना वक़्त?

आँसू अगर जम गए तो बेह न पाएंगे,
और बर्फ बनके तुम चैन से रेह न पाओगे।
अरे एक बार रो करके तो देखो,
ऑंसुओं की नगरी में हम स्वयं आपको ले जायेंगे।

बैठके ऑंसुओं की लेहरों पर,
खोलेंगे हम ऑंसुओं की नगरी का हर एक द्वार।
अपनी भावनाओं को प्रगट करके,
बन जायेंगे पानी की तरह आर पार।

धीरे धीरे बेह जायेगा आँसुओं का समंदर,
एक समय ऐसा आएगा, कुछ भी न रहेगा तुम्हारे अंदर।
इस बात से तुम खुद चौंक जाओगे,
के शुन्य होकर ही तुम खुदको पूरा पाओगे।