मैं!

मैं जलता हुआ सूरज भी हूँ और मैं बर्फीला चाँद भी हूँ,
मैं बेहता हुआ पानी भी हूँ और उगलती हुई ज्वाला भी हूँ,
मैं आकाश को छूता हुआ पहाड़ भी हूँ और धरती की गोद में बसी हुई खाई भी हूँ,
मैं बेहती हुई हवा भी हूँ और उस हवा से बननेवाली तरंग भी हूँ।

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डर

क्यों डर डर के जी रहे है इतना हम,
ज़िन्दगी होती जा रही है ख़तम|
जीवन में डर इतना है भर चूका,
जैसे बारिश में आ पड़ा हो सूखा|

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