डर

Dar

क्यों डर डर के जी रहे है इतना हम,
ज़िन्दगी होती जा रही है ख़तम|
जीवन में डर इतना है भर चूका,
जैसे बारिश में आ पड़ा हो सूखा|

छोटे थे तो माँ से डरते थे,
फिर गुरु से डरने लगे,
ज़िन्दगी की राह में चलते चलते इतना डरे,
के बड़े होके बेवजाह ही डरने लगे|

कुछ अच्छा करने से पेहले कुछ बुरा हो जाने का डर,
एक कदम आगे बढ़ाने से पेहले गिर जाने का डर|
मदद करने से पेहले मदद ना मिलने का डर,
प्यार का इज़हार करने से पेहले रिजेक्ट जो जाने का डर|

में ये नहीं केह रहा हूँ के डरना मना है,
डरो वहीं जहां ज़रूरी डरना है|
वरना ऐसी ज़िन्दगी का क्या करना है,
जहां डर डर के जीना और डर डर के ही मरना है|

डरो उस खुदा से जब तुमने किसीका दिल दुखाया,
डरो उस काम से जिसमे तुमसे किसीका भला ना हो पाया|
डरो उस ख्वाब से जिसमे तुमने किसीका बुरा चाहा,
डरो अपनेआप से जब तुमने खुदको ही रुलाया|

एक बार किसीका अच्छा करके तो देखो, क्या पता किस्मत बदल जाये,
दो कदम आगे बढाकर तो देखो, शायद रास्ते अपने आप खुल जाये|
फिर भी अगर तेरी किस्मत ना बदले और तुजे रास्ते ना मिले,
तो डर मत जाना मेरे दोस्त, बस एक आवाज़ लगाना, और मुझे बुला लेना|

किसीकी मदद करके तो देखो, शायद तेरी दुनिया ही बदल जाये,
प्यार का इज़हार करके तो देखो, क्या पता दिल से दिल मिल ही जाये|
लेकिन फिर भी अगर तेरी दुनिया ना बदले और दिल से दिल ना मिले,
तो डर मत जाना मेरे दोस्त,
मदद को चाहनेवाले भी बहोत है और दिल से दिल लगानेवाले भी बहोत है|

डर से तो डर भी इतना नहीं डरता,
जितना हम ज़िन्दगी से डरते है|
ज़िन्दगी के इस खेल में एक ही नियम है,
डर के आगे जीत है,
डर के आगे जीत है|

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